अनुभव के खज़ाने से : “ संतोष

दोस्तो आपने कई बार हमारे बड़े – बुजुर्गो को ऐसा कहेते हुवे सुना होगा की , “ आज की जेनेरेशन के लोगो को तो जीवन मे संतोष ही नहीं है , हमेशा भागते ही रहेते है ” और हम कहेते है की , “ अगर संतोष रखेंगे तो प्रगति कैसे करेंगे , कुछ बड़ा हासिल करना है तो भूख तो होनी ही चाहिए ना , तभी तो हम दुनिया मे कुछ बड़ा कर पाएंगे ” दोस्तो , हमारे बुजुर्ग लोग हमे प्यार करते है , उनकी नज़र मे उन्हे ये साफ साफ दिख रहा है की हम अपनी सफलता के असंतोष की वजह से ज़िंदगी के हर लम्हे को खुशी से जी नहीं रहे है , हर दिन बस बड़ी खुशी के पीछे भागते रहेते है , क्या ये सच नहीं है ? लेकिन दूसरी तरफ अगर हम संतोष रख कर बैठ गए तो मेरे नज़रिये से हम स्वार्थी कहेलाएंगे , क्योंकि हमे ये जीवन सिर्फ हमारे लिए जीने के लिए नहीं मिला , इस एक जीवन से लाखो जीवन को सवांरने के लिए मिला है , हर तरफ नज़र फैला कर देखो , हर इंसान सिर्फ अपना अपना जुटाने मे लगे है , तो ये दुनिया के लिए कौन सोचेंगा ? और अगर ऐसे मे हम भी संतोष रख कर बैठ जाए तो ? तो फिर क्या करे , क्या है इसका हल ? संतोष रखे , या ना रखे ? दोस्तो मेरे अनुभावों से कहु तो , हमे हर क्षण को भी सुख से जीना है और प्रगति के लिए दौड़ना भी है । लेकिन कैसे ? !!! , कुछ ऐसे !!! शायद ओशो की किताब मे पढ़ी हुई ये बात है जिसे हमे दिल मे उतार लेना चाहिए , “ आज तक जो प्राप्त हुवा है उसमे संतोष , जो कर्म कीया है उसमे असंतोष ” यानि आज इस घड़ी तक हमे जो भी मिला है उसमे संतोष रखो , और आज इस घड़ी तक हमने जो कीया है उसमे असंतोष रखो । अगर जो मिला उसमे संतोष है , तो हम इस लम्हे को खुशी से जी पाएंगे , और जो कीया उसमे असंतोष है , तो हम अपने कर्म को और भी बहेतर बनाने मे जुटे रहेंगे । यहा हमारे बड़े – बुजुर्गो की बात भी रहे गई ओर हमारी बात भी रहे गई , है ना ? बस तो अब देर किस बात की , “ ज़िंदगी को खुलके जियो और कर्म को लगातार बहेतर बनाते जाओ , जीवन का हर क्षण आनंद से भर जाएगा ” © चिराग उपाध्याय.